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Tuesday, July 29, 2014

आखिर क्या हो गया है हमारे मीडिया और समाज में ?

क्रीम लगाओ लड़की पटाओ

* पाउडर लगाओ
लड़की पटाओ

* डीयोडरंट लगाओ
लड़की पटाओ

* दिमाग की बत्ती जलाओ
लड़की पटाओ

* मंजन करो और
ताज़ा साँसों से
लड़की पटाओ

* एंटी डेनड्रफ शैम्पू लगाओ लड़की पटाओ

* कोई भी चिप्स खाओ
लड़की पटाओ

* फोन में फ्री स्कीम
का रीचार्ज कराओ
और लड़की पटाओ

* हद तो तब हो गयी जब
पुरुषों के
अंतर्वस्त्रों से
भी लड़की पटरही है
इनके विज्ञापनों में खास
बात ये है की आपको कुछ
करना नही है सिर्फ इन
चीजों को इस्तेमाल
करो लड़की खुद आपके
पास चल कर आएगी।

आखिर क्या हो गया है हमारे मीडिया और
समाज में ?

क्या ज़िंदगी का एक
ही मकसद है
लड़की पटाओ ?

लगता है भारत में सभी उत्पादों के
विज्ञापनों का एक
ही उद्देश्यहै
'लड़की पटवाना',.....!?!

Tuesday, July 15, 2014

किशोर वय व लड़के-लड़कियां सामाजिक मूल्यों, नैतिकताओं और वर्जनाओं से उदासीन और लापरवाह होते चले जा रहे हैं...

माडर्न लाइफ स्टाइल " की गिरफ्त में कसमसाने लगी है। किशोर वय व लड़के-लड़कियां सामाजिक मूल्यों, नैतिकताओं और वर्जनाओं से उदासीन और लापरवाह होते चले जा रहे हैं। दूसरे शब्दों में जीवन पर इसका संक्रमण तीव्र गति से फैल रहा है


पश्चिमी मुखौटे के अंदर समाज का वह विद्रूप चेहरा ज्यादा सक्रिय हो उठा है, जो घिनौना है, काम-वासना से भरा हुआ है। शहर के गली-कूचे इस संक्रमण से प्रभावित देखे जा सकते हैं। शराब-सिगरेट पीना, हलकी मादक दवाएं लेना, चुप-चुप सैर सपाटा, अचानक स्कूल से गायब हो जाना, साइबर कैफे में इंटरनेट पर अश्लीलता से सराबोर होना और बार आदि में जाना और जाने के लिए झूठ बोलना, ऐसे परिधानों का चयन करना, जिन्हें वे घर में भी पहनने का साहस जुटा नहीं पाते । यह सब फैशन के नाम कुप्रचलन बन गया है। इसका निवारण आवश्यक अन्यथा वह दिन दूर नही जब यह धरती गंदगी से इतना भर जाएगी कि , यही जीते जी नर्क हो जाएगी । 

Wednesday, July 9, 2014

उस दिन "बुलेट ट्रैन" की सोचना....

" समय की माँग - ईमानदार नीयत, दृढ़ इच्छाशक्ति और देशसेवा की भावना "
अभी हाल में 14.2% रेल किराये में बढ़ोतरी से मात्र 8000 करोड़ मिलेंगे ,.... पर इससे पहले से दबा-कुचला आम आदमी का जीना और मुहाल हो गया है।
क्या सरकार नहीं जानती कि देश में फैले व्यापक भ्रष्टाचार से रेलवे भी अछूती नहीं है ,.... ट्रेनों में तिल भर जगह नहीं, बाहर और ऊपर तक भर कर चल रही हैं ,.... फिर रेलवे घाटे में क्यों है ? ,.... अकेला "आयरन ओर ढुलाई" घोटाला ही पच्चास हज़ार करोड़ रूपए का है।
मतलब साफ़ है, सबसे पहले, देश से भ्रष्टाचार जड़मूल से मिटाना होगा ,.... जनलोकपाल, स्वराज, नापसन्दी, भ्रष्टों को वापिस बुलाने के बुनियादी अधिकार जनता को देने होंगे ,.... चुनाव, पुलिस, न्यायिक प्रणाली और जांच एजेन्सीयां स्वायत कर सुधारनी होंगी ,.... तभी देश और हर विभाग फायदे में आएगा ,.... फिर किराया बढ़ाने के बजाये घटाना पडेगा ,.... पानी मुफ्त मिलेगा ,.... बिजली, यातायात और सब वस्तुएं एकदम सस्ती होंगी ,…. हर बच्चे को अनिवार्य मुफ्त शिक्षा मिलेगी ,.... हर आम आदमी को रोटी कपडा, मकान और रोज़गार मिलेगा ,.... अंतिम आम आदमी तक सब सुखी होंगे।
जिस दिन, देश आत्म-निर्भर और अंतिम आम आदमी सुख-संपन्न हो जाए ,.... रेल का जनरल डिब्बा साफ़, इसका शौचालय ठीक और हर यात्री को पूरी सीट मिले ,.... उस दिन "बुलेट ट्रैन" की सोचना।
इसलिए, समय की माँग है - ईमानदार नीयत, दृढ़ इच्छाशक्ति और देशसेवा की भावना ! अन्यथा बाकी सब छलावा है।
जय हिन्द !